Sunday, 30 June 2013

बीते दिन

सावन जब झूम के आता है
बीते दिन याद दिलाता है 
मैं पहन के जब लहंगा चोली
माँ  के  घर अंगना में डोली 

डैडी जब घेवर लाते थे 
माँ तू खीर बनाती थी 
बाँध के राखी भाइयों को 
मैं खीर ,मिठाई खिलाती थी 

अब वो दिन सब बदल गए 
भाई दोनों परदेस गए 
अब राखी लिफाफों में जाती है 
उन्हें मेरी याद दिलाती है 

माँ अब भी खीर बनाती है 
और मुझे बुला खिलाती है 
 मै उनका मन बहलाती हूँ 
बीते दिन याद दिलाती हूँ 

मैं पहन के जब लहंगा चोली 
उनके घर अंगना में  डोली .

3 comments:

  1. This is absolutely excellent. The power of memory, the playfulness of rhyme, the wonder of rain!!

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  2. From a bhai to his sister, Didi now we know from where Akhil got his writing DNA!! This is superb and heartfelt...albeit a lot of kheer use to go your way too...Nostalgic....

    Manoj

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