Monday, 2 September 2013

gracefully accept

मोंगरे के फूलों का गजरा 
जब मैं बालों  में  लगाती थी 
 अपने  घुंघराले  काले बालों  को देखकर 
खुद ही मोहित हो जाती थी 

अब बालों में चांदनी खिली  है 
 हिना  और डाई  से भी छिप  नहीं पाती है 
बढ़ती हुई  उम्र को  कैसे gracefully accept करूं 
मुझे समझ  नहीं आती है 

हर अंग प्रत्यंग के अपने ही  लटके झटके हैं
समय समय पर टेस्ट कराओ 
सबके  अपने ही नखरे हैं 
कभी पेट में गैस बन जाती है 
कभी घुटनों में पीड़ा सताती है 
बढ़ती हुई  उम्र को  कैसे gracefully accept करूं 
मुझे समझ  नहीं आती है 

कभी इसके दुखों को देखकर 
कभी उसकी  परेशानियों को सुनकर 
 मेरे  दिल  की  चाल बढ़ जाती है 
बढ़ती हुई  उम्र को  कैसे gracefully accept करूं 
मुझे समझ  नहीं आती है 

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